जब तुम भी मुझमें समां जाओ तो बताना
कहीं गिर जाओ और संभलना हो
कुछ टूटा टूटा सा लगें, अधूरा सा लगे
मन थोड़ा भारी हो, आँखे भर आयी हो
जब तुम भी भावों के अमृत सागर में डूब जाओ तो बताना
जब तुम भी मुझमें समां जाओ तो बताना
अक्सर लोग यूं ही बातें कर लिया करते हैं
नासमझी में नादानी में बातें बिगड़ जाया करती हैं
तुम्हें कुछ अनजाना सा अनछुआ सा
कुछ बनता हुआ लगे तो बताना
कुछ बिछड़ता हुआ, कोई दूर जाता हुआ
दिल बैठा बैठा हुआ, दुनिया खाली हुआ
कभी किसी अपने की तलाश में मन थका हुआ
जब ये सारी चीजें एक साथ लगने लगे न तुम्हें
जब बातों को व्यक्त करने में सक्षम न हो पाओ तुम तो बताना
जब तुम भी मुझमें समां जाओ तो बताना
अटखेलियाँ तो हम बचपन में भी खेला करते थे
दो चार बातें कुछ गलत बोल दिया करते थे
नटखट तो हम बहुत थे बचपन में, पर उनके कान्हा हुआ करते थे
माँ नाराज़ होती थी परेशान भी होती थी
दिन भर मौन व्रत धारण कर, शाम गले से लगा लेती थी
मुझे कष्ट में देख वो स्वयं रो लिया करती थी
वो मुझमें बसती थी मैं उनमे बसता था
वो यशोदा मैया थी मेरी, मैं उनका लाड़ला कान्हा था
जब तुम उस पगली माँ की जगह ले पाओ तो बताना
जब तुम भी इस कान्हा को समझ पाओ तो बताना
जब तुम भी मेरी राधा बन पाओ तो बताना
ज्यादा नहीं बस इतनी सी गुजारिश हैं तुमसे
यूँ ही बस कभी याद आ जाऊं तो बताना
जब तुम भी मुझमे समां जाओ तो बताना