Sunday, November 19, 2017

रानी लक्ष्मीबाई - नारी सशक्तिकरण

जब मनु का विवाह झांसी के महाराज गंगाधर राव से तय हुआ और विवाह संपन्न कराने के लिए मोरोपंत मनु को झांसी ले गए तो वहाँ पर मनु की सेवा में कई दासियाँ लग गयी। 

मनु और दसियों के बीच की बातचीत का एक भाग -

दासी - मनु के निकट आयी और आदरपूर्वक प्रणाम किया।
मनु - कोन हो तुम?

दासी - आपकी दासी, सुंदर मेरा नाम है।
मनु - मेरी दासी कैसे?

दासी - आप हमारी महारानी हैं। मैं सेवा में रहूंगी।
मनु - मेरी दासी कोई भी नही होगी यहाँ। मेरी सखी सहेली होकर रहोगी। रहोगी न?

दासी - सदा सरकार। हम सोलह दासियाँ सरकार की सेवा में रहेंगी।
मनु - दासियाँ नहीं, मेरी सखी सहेलियाँ। 

इसी बीच कुछ दासियाँ नृत्य गान द्वारा अपना हर्ष प्रकट करना चाहती थी। मनु ने मान लिया। साथ ही यह भी कहा - तुम सब को घोड़े की सवारी सिखलाई जाएगी। तलवार, बंदूक, बर्छी, छुरी, कटार इत्यादि भी चलाना - अच्छी तरह चलाना सीखो। 
मनु ने आगे कहा - तुम लोग कुश्ती लड़ना सीखोगी? अखाड़े में कुश्ती लड़ना?
कुछ साखियों ने घूँघट डाल दिये कुछ ने मुँह फेर लिया। तभी सुंदर मुस्कुराकर बोली - तब तो इन फूलों से पूरा अखाड़ा भर जाएगा।
मनु ने भी उसी हँसी के साथ कहा - और तुम्हारे बालों में अखाड़े की मिट्टी भर जाएगी।
वे सब खिलखिलाकर हँस पड़ी।
तभी मनु कुछ गंभीरता के साथ बोली - परंतु वह मिट्टी तुम्हारे केशो में इन फूलो से भी बढ़कर सुहावनी लगेगी।
सुंदर - लेकिन सरकार बालों की शोभा मिट्टी से?
मनु - "फूलों से नाता बनाये रखो, परंतु मिट्टी से संबंध तोड़कर नही"

मनु ने आगे कहा - सुना है कि झांसी के लोग फूलों को बहुत प्यार करते हैं। अच्छा हैं, परंतु क्या दुबले - पतले घोड़े पर सोने - चांदी का जीन अच्छा लगता हैं?
सुंदर तुरंत उमंग के साथ बोली - सरकार, मैं आपकी बात समझ गयी।।


वृंदावनलाल वर्मा द्वारा लिखी पुस्तक "रानी लक्ष्मीबाई" से साभार !!

Tuesday, July 25, 2017

प्यार - एक अनकही दास्तां

ये अजीब नजाकत है मेरी, जब भी पास से गुजरता हूँ
दिल तो बहुत कुछ चाहता हैं मगर नजरें चुरा जाता हूँ

कहते हैं एकता में ताकत होती हैं, मैं यहीं पिछड़ जाता हूँ
दिल, दिमाग और नयनों की अनेकता मैं वो लम्हा गवां देता हूँ

कई दफ़ा बातें की हैं मैंने उससे, फ़ोन पर भी
पर किसी काम से, मन की बात थोड़े ही न बतलाता हूँ

होंगे कई अरमान भी उसके, इसी उहाँपोहं मे मैं रहता हूँ
उसकी आँखें भी कभी दौड़ेगी उस ओर, इसी का मैं इंतजार करता हूँ

प्यार एक एहसास हैं, प्यार जीवन जीने की प्रेरणा हैं
जितना धीरे धीरे बढ़ता है, रंग उतना ज्यादा गहरा होता है


उस दर्द के एहसास के कारण, मैं खुद के वाणी को रोक लेता हूँ
प्यार तो बस एक अनुभूति है, ये सबको बतलाता हूँ

ये अजीब नजाकत है मेरी, जब भी पास से गुजरता हूँ
दिल तो बहुत कुछ चाहता हैं मगर नजरें चुरा जाता हूँ

Thursday, June 29, 2017

नारी स्वतंत्रता और सशक्तिकरण

बहुत ज्ञानी मिलेंगे यहाँ, संस्कार का पाठ पढ़ाने वाले
कोई नहीं मिलेगा, अश्लील सिनेमा का विरोध करने वाला

सशक्तिकरण की आड़ में, अश्लीलता का ये कैसा गंदा खेल
व्यापार ही धर्म है यहाँ, भ्रष्ट दिमाग, गंदी सोच और पैसे का ये मेल

अर्धनग्न तस्वीरें अंतरंग दृश्य, ये कैसा सम्मान हैं
भोग विलास के वस्तु रूप में चित्रण, उसका घोर अपमान हैं

अरे! व्यापार नहीं, यदि नारी स्वतंत्रता और सशक्तिकरण हैं एकमात्र उद्देश्य
फ़िल्म बनाओ सावित्रीबाई फुले पर, जिन्होंने बालिकाओं के लिए खोले स्कूल अनेक


अरे फ़िल्म बनाओ रानी लक्ष्मीबाई, चेनम्मा, विजया लक्ष्मी पंडित पर
जिन्होंने घर की चार दिवारी तोड़, रचे महानतम इतिहास अनेक


फ़िल्म बनाओ कल्पना चावला, बछेंद्री पाल और सरोजिनी नायडू पर
व्यक्तिगत स्वतंत्रता के कारण जो चढ़े जीवन की उच्चाइयों पर


समाज की सोच बदलो, महिलाओं की महानता का परिचय करवाकर
समाज को मत बिगाड़ो, नारी को वस्तु रूप में चित्रित कर

Wednesday, June 14, 2017

राजकवि चंदवरदाई जी

सभी हिंदी भाषी प्रेमियों के लिए, हिंदी भाषा के प्रथम कवि के रूप में विख्यात राजकवि श्री चंदबरदाई जी का संक्षिप्त परिचय -
राजकवि श्री चंदबरदाई जी को हिंदी का पहला कवि और उनकी रचना "पृथ्वीराज रासो" को हिंदी की पहली रचना होने का सम्मान प्राप्त है। पृथ्वीराज रासो हिंदी का सबसे बड़ा काव्य-ग्रंथ है। इसमें 10,000 से अधिक छंद हैं और तत्कालीन प्रचलित 6 भाषाओं का प्रयोग किया गया है। इस ग्रंथ में उत्तर भारतीय क्षत्रिय समाज व उनकी परंपराओं के विषय में विस्तृत जानकारी मिलती है, इस कारण ऐतिहासिक दृष्टि से भी इसका बहुत महत्व है।

वे भारत के महान सम्राट पृथ्वीराज चौहान तृतीय के मित्र तथा राजकवि थे। सम्राट पृथ्वीराज चौहान ने 1165 से 1192 तक अजमेर व दिल्ली पर राज किया। यही राजकवि चंदबरदाई जी का रचनाकाल भी था। इनका जीवन पृथ्वीराज चौहान के जीवन के साथ इस तरह मिला हुआ था कि अलग नहीं किया जा सकता। युद्ध में, आखेट में, सभा में, यात्रा में, सदा महाराज के साथ रहते थे और जहाँ जो बातें होती थीं, सब में सम्मिलित रहते थे। यहां तक कि मुहम्मद गोरी के द्वारा जब पृथ्वीराज चौहान को परास्त करके एवं उन्हे बंदी बना करके गजनी ले जाया गया तो ये भी स्वयं को वश मे नही कर सके एवं गजनी चले गये। ऐसा माना जाता है कि कैद मे बंद पृथ्वीराज चौहान को जब अन्धा कर दिया गया तो उन्हें इस अवस्था में देख कर इनका हृदय द्रवित हो गया एवं इन्होंने गोरी के वध की योजना बनायी। उक्त योजना के अंतर्गत इन्होंने पहले तो गोरी का हृदय जीता एवं फिर गोरी को यह बताया कि पृथ्वीराज चौहान शब्दभेदी बाण चला सकता है। इससे प्रभावित होकर मोहम्मद गोरी ने पृथ्वीराज चौहान की इस कला को देखने की इच्छा प्रकट की। प्रदर्शन के दिन चंदवरदाई जी गोरी के साथ ही मंच पर बैठे। अंधे पृथ्वीराज चौहान को मैदान में लाया गया एवं उनसे अपनी कला का प्रदर्शन करने को कहा गया। पृथ्वीराज चौहान के द्वारा जैसे ही एक घण्टे के ऊपर बाण चलाया गया गोरी के मुँह से अकस्मात ही "वाह! वाह!!" शब्द निकल पड़ा बस फिर क्या था चंदबरदाई जी ने तत्काल एक दोहे में सम्राट पृथ्वीराज चौहान को यह बता दिया कि गोरी कहाँ पर एवं कितनी ऊँचाई पर बैठा हुआ है। वह दोहा इस प्रकार था:

चार बाँस चौबीस गज, अंगुल अष्ट प्रमान!
ता ऊपर सुल्तान है, मत चूके चौहान!!

इस प्रकार राजकवि चंदबरदाई जी की सहायता से सम्राट पृथ्वीराज चौहान के द्वारा गोरी का वध कर दिया गया। इनके द्वारा रचित पृथ्वीराज रासो को हिंदी भाषा का पहला प्रामाणिक काव्य माना जाता है।

Thursday, June 1, 2017

राजनीति

 क्या कहा उसने, सुना नहीं शायद कभी
क्यों न जाऊँ मैं, उस राह मे कभी भी
मुझे भी पता है, वहाँ दलदल है
मेरे पाँव भी फँस सकते हैं वहाँ, लेकिन
मेरे अंदर मन मे भी तो बहुत हलचल है

बेशक दुनिया गाली देती है, वहाँ बसने वालो को
गंदगी बहुत है, दागदार हो गए सबके दामन वहाँ
लेकिन अच्छी जिंदगी तो, यहाँ पर भी नहीं है
हमे पता है, गलतियाँ कहाँ है – कैसी है
तो बताओ क्यों न जाऊँ मैं, उस राह में कभी भी

लोग गलतियाँ ढूँढ निकालते हैं, समाधान भी खोज लेते है
न जाने क्यों वो हर बार, अपने आप को रोक लेते हैं
सामर्थ्य है हम सबमें, हमें ही बदलना होगा
कीचड में ही सही, उम्मीद का पुष्प तो खिलाना ही होगा
हम लोगों को तो, आगे आना ही होगा

आखिर कब तक लोग, खुद को रोकते रहेंगे
आखिर कब तक हम, उसे कोसते रहेंगे
कोई अधिकार नही हम लोगो को कोसने का
कोई अधिकार नही हम लोगो को धिक्कारने का
जब तक हम खुद पीछे भागते रहेंगे

उम्मीद करते है, अच्छे सुगंध की जरूर हम
फूल गुलाब का फिर लगाते क्यों नहीं
चाहत रखते हैं, अच्छे फल की जरूर हम
पेड आम का फिर लगाते क्यों नहीं
लगा भी लिया तो क्या, उसे सिंचते जहर से फिर क्यो हम

हमने ये चीजे अपने ही लोगों से तो सीखी हैं
ये जहर भी हम लोगों ने ही तो फैलाया है
अच्छे लोगो को भी तो हमने ही रोका है
ऐसे क्यों न मिलें केवल बुरे लोग वहाँ
तो बताओ क्यों न जाऊँ कभी – भी मैं वहाँ

हम कहते हैं, सुधरनी चाहिए ये व्यवस्था
दीमक खोखला कर गए, इस आधुनिक युग में भी जिसे
उसे अच्छा होता हुआ, देखना तो चाहते हैं जरूर हम
लेकिन फिर क्यों, कोरी कागज छोड जाते उस दिन हम
जब हमारे ही हाथों में होती है, देश के तकदीर की कलम

मन में एक आग सी उठती है जरूर, लेकिन
उस आग में स्वयं भस्म हो जाते हैं हम
शरीर काँप उठता है, ह्रदय पिघल जाता है, फिर भी
क्यों नहीं बनाते हम, खुद में बदलाव की कोई नीति
बता दूँ मैं सबको, इसे ही कहते हैं राजनीति

जब तक अच्छे लोग जाऐंगे नहीं, ये बुरी बनी रहेगी
लोग नहीं बदलेंगे तो ये गलती – सडती रहेगी
कहने के लिए तो ये अवश्य बदलती रहेगी
लेकिन हमारे दामन की दाग शाश्वत बनी रहेगी
अच्छी राजनीति केवल इतिहास के पन्नों में उतरती रहेगी!!!

सच्ची बात

मैं किसपे इतना गुमान करता हूँ
न ये जमीं मेरी ना ये आसमां मेरा
कपड़े दर्जी-बुनकर के, खाना किसान-मजदूर का खाता हूं
इस मिट्टी में जन्म लिया, इस मिट्टी में मिल जाता हूँ
अक्सर यही सोचता हूँ, मैं किसपे इतना गुमान करता हूँ


ये जिंदगी की उच्चाइयाँ, फिकी सी लगती है
ये शानो-शौकत, ये शौहरत चुभता है मन में
जब जब मैं उन मलिन बस्तियों से गुजरता हूँ
नंगे पाँव प्यासी निगाहें उन बच्चों को मंडराते देखता हूँ
अक्सर यही सोचता हूँ, मैं किसपे इतना गुमान करता हूँ


हमारा देश बहुत महान है, कई वीर गाथाएं यहाँ की
इसकी आधारशिला उनके आँसू-पसीने-रक्त से रखे गए
बहुत दर्द होता है, जब लोग इसे धिक्कारते है
विदेशो में बसकर खुद को भारतीय कहते हैं
स्वयं बदल नही सकते और बड़ा बदलाव चाहते है

न जाने में कब-कब किस-किस को ये कहता हूँ 
अक्सर यही सोचता हूँ, मैं किसपे इतना गुमान करता हूँ


वृद्धाश्रम का कैसा चलन, माँ-बाप कभी भगवान थे यहाँ
'गुरुर ब्रह्मा' के देश मे, शिक्षा आज व्यवसाय बना
अन्नदाता अलंकार से सुशोभित, किसान आज लाचार हुआ
धरती माँ चंदा मामा हुए जहाँ, आज जीना वहाँ दुश्वार हुआ


ये सब कोरी कल्पना नही, सच्ची बात बताता हूँ
अक्सर यही सोचता हूँ, मैं किसपे इतना गुमान करता हूँ

Monday, April 24, 2017

ऐ जिंदगी

विचलित नहीं शायद, परेशान जरूर हूँ
डगमगाया हूँ शायद, गिरा नहीं हूँ



ऐ जिंदगी, तेरा रुख आज तक 
मैंने स्वयं ही मोड़ा है
अपने रास्ते आप ही बनाता हूँ
मुझे तोड़ दे, मेरा रुख मोड़ दे
ऐसी शक्ति तुझमे नहीं शायद
ऐसी शक्ति तुझमे नहीं शायद


आज अकेला हूँ, थका हुआ हूँ
रास्ते में कंकड़ हैं, खाली पावँ हूँ
कितना भी परेशान हूँ, कमजोर नहीं शायद
शक्ति हारी जरूर, हिम्मत नहीं शायद



परेशान जरूर हूँ, विचलित नहीं शायद
गिरा तो नहीं हूँ, डगमगाया हूँ शायद


कुछ पल, ये इम्तिहाँ बीत जाने दो
कुछ पल, ये समय गुजर जाने दो
ये जीवन सुख - दुख का तो संगम हैं
हँसने दो, रोने दो, मुस्कुराने दो
आखिर तुम्हारे रंग में ही रंग जाने दो



ऐ जिंदगी तू विशाल बहुत है
इतने कम समय में लोगो को
ना यूं गुम हो जाने दो

ऐ जिंदगी तू विशाल बहुत है
लोगो को थोड़ा मुस्कुराने दो
लोगो को थोड़ा मुस्कुराने दो



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Friday, March 10, 2017

मैं बहुत जिद्दी हूँ

मैं बहुत ही जिद्दी हूँ
आदत नहीं शायद  
समाज से सीखा गुर है
मैं बहुत जिद्दी हूँ    



काम किसी के होते नहीं 
करवाना पड़ता है
मांगने वाले दूर बैठे है
हक़ मिलते नहीं यहाँ
छीनना पड़ता है
मैं बहुत जिद्दी हूँ

रोकते थे जो पहले   
आज सलाम ठोकते है
कल के रास्ते के कांटे 
 आज फूल बने बैठे हैं 

इसी उम्मीद में जीता हूँ
इसी उम्मीद में जी रहा हूँ

कुछ करके दिखाना है
कुछ करके दिखाना है
समाज को बदलना है
समाज को बदलना है


मैं बहुत जिद्दी हूँ
मैं बहुत ही जिद्दी हूँ
आदत नहीं शायद  
समाज से सीखा गुर है...

Monday, January 9, 2017

दलदल

ये दुनिया बिष से भरा प्याला है
कुछ तो प्रेम रस घोलो इसमे
प्याली सफेद न कर सकते
काला तो मत करो इसे


राह न दिखा सके तो क्या हुआ
राह न भटकाओ इसे
रोशन न कर सकते इस दुनिया को 
अंधकार न फैलाओ इसमे


उससे पूछा तो होता 
एक बार, उसकी सुनी तो होती
उसने चोरी क्यों की
क्यों कूदा इस दलदल मे


हाथ थाम कर तो देखते 
मन टटोल कर तो देखते
उस बदजुबां बालक का
कहीं वो अनाथ तो नही











पत्थर तो सभी मारते है
कभी उसके घाव को हाथ लगाते
पता चलता वो गुमनाम चेहरा भी
हमारे ही रक्त से सींचा हुआ है


तुमने इतना ही जाना इसे
जितना पर्दे ने दिखाया तुम्हे
कभी पर्दा हटाया तो होता 
कभी अंदर झाँक कर देखा तो होता


कभी उससे पूछा तो होता
कभी अपनापन दिखाया तो होता
कभी प्यार बिखेरा तो होता
कभी हाथ बढ़ाया तो होता


ये दुनिया बिष से भरा प्याला है
कुछ तो प्रेम रस घोलो इसमे
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