Thursday, June 1, 2017

सच्ची बात

मैं किसपे इतना गुमान करता हूँ
न ये जमीं मेरी ना ये आसमां मेरा
कपड़े दर्जी-बुनकर के, खाना किसान-मजदूर का खाता हूं
इस मिट्टी में जन्म लिया, इस मिट्टी में मिल जाता हूँ
अक्सर यही सोचता हूँ, मैं किसपे इतना गुमान करता हूँ


ये जिंदगी की उच्चाइयाँ, फिकी सी लगती है
ये शानो-शौकत, ये शौहरत चुभता है मन में
जब जब मैं उन मलिन बस्तियों से गुजरता हूँ
नंगे पाँव प्यासी निगाहें उन बच्चों को मंडराते देखता हूँ
अक्सर यही सोचता हूँ, मैं किसपे इतना गुमान करता हूँ


हमारा देश बहुत महान है, कई वीर गाथाएं यहाँ की
इसकी आधारशिला उनके आँसू-पसीने-रक्त से रखे गए
बहुत दर्द होता है, जब लोग इसे धिक्कारते है
विदेशो में बसकर खुद को भारतीय कहते हैं
स्वयं बदल नही सकते और बड़ा बदलाव चाहते है

न जाने में कब-कब किस-किस को ये कहता हूँ 
अक्सर यही सोचता हूँ, मैं किसपे इतना गुमान करता हूँ


वृद्धाश्रम का कैसा चलन, माँ-बाप कभी भगवान थे यहाँ
'गुरुर ब्रह्मा' के देश मे, शिक्षा आज व्यवसाय बना
अन्नदाता अलंकार से सुशोभित, किसान आज लाचार हुआ
धरती माँ चंदा मामा हुए जहाँ, आज जीना वहाँ दुश्वार हुआ


ये सब कोरी कल्पना नही, सच्ची बात बताता हूँ
अक्सर यही सोचता हूँ, मैं किसपे इतना गुमान करता हूँ

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