घर नहीं यह मकान हैं
'परिवार' की खोखली शान है
मोतियों से गूँथी हुई वह
अब पत्थरों की माला है
प्यार का वह धागा आज
जरुरत का एक बंधन है
दादी - नानी की कहानियाँ
बच्चे कहाँ जानते हैं
अब छुट्टियों में तों
गोवा और मनाली जाते हैं
प्यार, विश्वास, त्याग और समर्पण
ये परिवार की बुनियाद हैं
परवरिश की बात नहीं
अब सिनेमा ही संस्कार हैं
क्या यही परिवार है ?
कैसी है यह विडंबना
लोग दूर - दूर रहते हैं
पर्व - त्यौहारों में भी
काम ही करते रहते हैं
घर नहीं यह मकान हैं
'परिवार' की खोखली शान हैं
मोतियों से गूँथी हुई वह
अब पत्थरों की माला है
प्यार का वह धागा आज
जरुरत का एक बंधन है...