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Wednesday, October 26, 2016

मैं चला हूँ...

मैं चला हूँ अपने घर से
आगे बढने के लिए, बस आगे ही बढने के लिए
रास्ते में मिले कई राहगीर मुझे
राह बताने के लिए, कुछ भटकाने के लिए

कुछ लोगों के पाँव जम चुके थें
वे आगे बढते ही चले जा रहें थें
कुछ लोगों के पाँव थम चुके थें
वे बीच रास्ते मे ही रूक चुके थें
उस मोड पर जाकर, वे खुद को मोड चुके थे

मैने लोगो को रौंदकर नहीं
साथ लेकर आगे बढना सीखा था
ऊँची इमारतें बहुत देखी जीवन में
कभी फर्श पर भी आना चाहा था

क्या मैं उस हिमालय-सी ऊँची पहाडी पर पहुँच पाता
अगर मैं अकेले ही आगे निकल जाता


कुछ लोग मुझे रौंदकर आगे निकल तो गएं
मैं पीछे रह गया, पता नही, शायद.... आगे

बेशक ! दुनिया मुझे पागल कहती है लेकिन
संगीत के लिए संगीतकार तो पागल ही होता है
जैसे प्यासा पानी के लिए पागल होता है
जैसे प्रेमी प्यार के प्याले के पागल होते है
जैसे कविता के लिए कवि पागल होता है
वैसे ही, काम के लिए जुनून तो पागल ही होता है

दौड तो समाप्त हुई नहीं अभी लेकिन
इस पागल दिल की एक कल्पना
मैं पीछे रह तो जाऊँगा अवश्य शायद लेकिन
मेरे दिल बाग में होंगें फूल अनेक
उनकें नसीब में केवल काँटें, अवश्य एक.......