Monday, October 31, 2016

दिवाली - बच्चों वाली

सपनों से लगते वो दिन
हफ़्तों से चलती तैयारी
उछल - कूद और मस्ती वाली
हम बच्चों की वो दिवाली


बड़े - बुजुर्ग सफाई करते
हम दिये - मूर्ति - घरोंदे बनाते
घर मिट्टी- मिट्टी हो जाता
हर दिन चलता यही डरामा


घरोंदे को हम सजाते
लक्ष्मी - गणेश को उसमे बैठाते
पहले इनकी पूजा होती
फिर पुरे घर में दिये जलाते


साथ मिलकर मिठाइयां खाते
पटाखे और फुलझड़ियां जलाते
आई दिवाली खुशियाँ लायीं
उछल - कूद और मस्ती वाली
हम बच्चों की वो दिवाली

Sunday, October 30, 2016

परिवार

घर नहीं यह मकान हैं
'परिवार' की खोखली शान है


मोतियों से गूँथी हुई वह
अब पत्थरों की माला है
प्यार का वह धागा आज
जरुरत का एक बंधन है


दादी - नानी की कहानियाँ
बच्चे कहाँ जानते हैं
अब छुट्टियों में तों
गोवा और मनाली जाते हैं


प्यार, विश्वास, त्याग और समर्पण
ये परिवार की बुनियाद हैं
परवरिश की बात नहीं
अब सिनेमा ही संस्कार हैं
क्या यही परिवार है ?


कैसी है यह विडंबना
लोग दूर - दूर रहते हैं
पर्व - त्यौहारों में भी
काम ही करते रहते हैं


घर नहीं यह मकान हैं
'परिवार' की खोखली शान हैं


मोतियों से गूँथी हुई वह
अब पत्थरों की माला है
प्यार का वह धागा आज
जरुरत का एक बंधन है...

Wednesday, October 26, 2016

मैं चला हूँ...

मैं चला हूँ अपने घर से
आगे बढने के लिए, बस आगे ही बढने के लिए
रास्ते में मिले कई राहगीर मुझे
राह बताने के लिए, कुछ भटकाने के लिए

कुछ लोगों के पाँव जम चुके थें
वे आगे बढते ही चले जा रहें थें
कुछ लोगों के पाँव थम चुके थें
वे बीच रास्ते मे ही रूक चुके थें
उस मोड पर जाकर, वे खुद को मोड चुके थे

मैने लोगो को रौंदकर नहीं
साथ लेकर आगे बढना सीखा था
ऊँची इमारतें बहुत देखी जीवन में
कभी फर्श पर भी आना चाहा था

क्या मैं उस हिमालय-सी ऊँची पहाडी पर पहुँच पाता
अगर मैं अकेले ही आगे निकल जाता


कुछ लोग मुझे रौंदकर आगे निकल तो गएं
मैं पीछे रह गया, पता नही, शायद.... आगे

बेशक ! दुनिया मुझे पागल कहती है लेकिन
संगीत के लिए संगीतकार तो पागल ही होता है
जैसे प्यासा पानी के लिए पागल होता है
जैसे प्रेमी प्यार के प्याले के पागल होते है
जैसे कविता के लिए कवि पागल होता है
वैसे ही, काम के लिए जुनून तो पागल ही होता है

दौड तो समाप्त हुई नहीं अभी लेकिन
इस पागल दिल की एक कल्पना
मैं पीछे रह तो जाऊँगा अवश्य शायद लेकिन
मेरे दिल बाग में होंगें फूल अनेक
उनकें नसीब में केवल काँटें, अवश्य एक.......   

Saturday, October 22, 2016

काँपते हुए कदम

मन में कुछ यादें ऐसे बस गई
उसे भूला नहीं पा रहा हूँ मैं
काम करने की इच्छा होते हुए भी
काम नहीं कर पा रहा हूँ मैं
काँटो की तरह ऐसी चुभी वो मन में
निकाल नहीं पा रहा हूँ मैं
काँपते हुए कदमों के साथ
आगे नहीं बढ पा रहा हूँ मैं
तीरो से भी ज्यादा छलनी किया
उन बातो ने दिल को मेरे
उस गहरे असीम घाव को
आज भी भर नहीं पा रहा हूँ मैं
आज भी भर नहीं पा रहा हूँ मैं
उन तीरो ने अवरूद्ध किया मेरा मार्ग
जिससे आगे बढ सकता था मैं
उस अंधकारमय रास्ते में भटकता-भटकता
कहाँ तक पहुँच सकता था मैं
इस मँझदार में कैसे पहुँचा
समझ नहीं पा रहा हूँ मैं
शायद गलती मेरी ही थी
फिर भी उन बातों को भूला नहीं पा रहा हूँ मैं
उस दिन उन शब्दो को सुन जब रोया था मैं
आवाज रूक गई थी मेरी
कंठ सूख गया था मेरा
शब्द नहीं थे मेरे पास हालात बयाँ करने को
मेरे एक-एक आँसू ऐसे गिरे धरा पर
ऐसे नम हुई आँखें मेरी कि
जैसे एक सपना टूट गया मेरा
और आज तक खुद को ठहरा हुआ महसूस करता हूँ मैं
ठहरा हुआ महसूस करता हूँ मैं
उन बातों को आज भी याद कर
दिल में एक चोट महसूस करता हूँ मैं
जिसकी आशा न थी मुझे
कानों में तैरते उन शब्दो को
आज भी सुन पाता हूँ मैं
आज भी सुन पाता हूँ मैं
इंतजार कर सकता हूँ मैं
बिना उम्मीद के सहारे
आगे नहीं बढ सकता हूँ मैं
अपने कदम नहीं बढा सकता हूँ मैं
केवल इंतजार कर सकता हूँ मैं
हाँ, इंतजार ही कर सकता हूँ मैं